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Thursday, 19 December 2013

मर जाती है माँ

बैगानों की तरह अपने घर जाती है माँ 
हर रोज अपमान का जहर खाती है माँ 

कहीं नर्क न कर दे बेटे की जिंदगी बहू

कुछ कहने से पहले ठहर जाती है माँ 

जवाँ बेटों ने बांटी है जिम्मेदारी उसकी

कभी इस, कभी उस शहर आती है माँ
 
कभी चश्मा टूट जाता है तो कभी दिल 

पोते-पोतियों को देखकर घबराती है माँ

स्त्री की यात्रा में ये कैसा पड़ाव हैं 
दुआ देते हुए इक दिन मर जाती है माँ 

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