बैगानों की तरह अपने घर जाती है माँ
हर रोज अपमान का जहर खाती है माँ
कहीं नर्क न कर दे बेटे की जिंदगी बहू
कुछ कहने से पहले ठहर जाती है माँ
जवाँ बेटों ने बांटी है जिम्मेदारी उसकी
कभी इस, कभी उस शहर आती है माँ
कभी चश्मा टूट जाता है तो कभी दिल
पोते-पोतियों को देखकर घबराती है माँ
स्त्री की यात्रा में ये कैसा पड़ाव हैं
दुआ देते हुए इक दिन मर जाती है माँ
हर रोज अपमान का जहर खाती है माँ
कहीं नर्क न कर दे बेटे की जिंदगी बहू
कुछ कहने से पहले ठहर जाती है माँ
जवाँ बेटों ने बांटी है जिम्मेदारी उसकी
कभी इस, कभी उस शहर आती है माँ
कभी चश्मा टूट जाता है तो कभी दिल
पोते-पोतियों को देखकर घबराती है माँ
स्त्री की यात्रा में ये कैसा पड़ाव हैं
दुआ देते हुए इक दिन मर जाती है माँ
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